चीनी करीब 40 फीसदी महंगी,चीनी के दाम पर सरकार का बड़ा फैसला: 10 लाख टन रॉ शुगर होगी शुल्क-मुक्त आयात, थोक खरीदारों पर स्टॉक लिमिट लागू,



नई दिल्ली/मुंबई। देश में चीनी की बढ़ती कीमतों ने आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ मिठाई, खाद्य प्रसंस्करण, पेय पदार्थ और अन्य उद्योगों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले कुछ महीनों में चीनी के दाम में तेज उछाल के बाद केंद्र सरकार ने बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और जमाखोरी पर अंकुश लगाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख मीट्रिक टन रॉ शुगर का शुल्क-मुक्त आयात करने की अनुमति दी है। यह आयात टैरिफ रेट कोटा यानी TRQ के तहत होगा।

सरकार ने इसके साथ ही चीनी के बड़े थोक उपभोक्ताओं के लिए भी स्टॉक रखने की सीमा तय की है। सितंबर से नवंबर 2026 के बीच प्रति माह 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी इस्तेमाल करने वाले थोक उपभोक्ता अधिकतम 15 दिन की खपत के बराबर स्टॉक ही रख सकेंगे। इसका उद्देश्य बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने, जमाखोरी और सट्टेबाजी पर रोक लगाना है।

तीन महीने में चीनी करीब 40 फीसदी महंगी

चीनी की कीमतों में हाल के महीनों में असाधारण तेजी देखने को मिली है। उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार तीन महीने में चीनी के दाम करीब 40 फीसदी यानी लगभग 19 रुपये प्रति किलो तक बढ़े हैं। गुड़ के दाम भी लगभग 24 फीसदी बढ़े हैं।

इस तेजी का असर केवल चीनी और गुड़ तक सीमित नहीं है। चावल की कनकी, मक्के का आटा, इडली रवा/राइस फ्लोर, पशु आहार और पोल्ट्री फीड जैसी वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इससे संकेत मिलता है कि खाद्य महंगाई का दबाव रसोई से लेकर पशुपालन और खाद्य उद्योग तक पहुंच रहा है।

प्रमुख खाद्य वस्तुओं में कीमतों का असर

उत्पाद| मौजूदा दाम| तीन माह पहले| बढ़ोतरी
चीनी| करीब ₹67/kg| ₹48/kg| ₹19 यानी करीब 39.6%
गुड़| करीब ₹65/kg| ₹50/kg| ₹15 यानी 24%
चावल कनकी| करीब ₹29/kg| ₹25/kg| ₹4 यानी 16%
मक्के का आटा| करीब ₹40/kg| ₹36/kg| ₹4 यानी 11.1%
इडली रवा/राइस फ्लोर| करीब ₹42/kg| ₹38/kg| ₹4 यानी 10.5%
पशु आहार| करीब ₹32/kg| ₹29/kg| ₹3 यानी 10.3%
पोल्ट्री फीड| करीब ₹25/kg| ₹23/kg| ₹2 यानी 8.7%

चीनी की कीमतों में तेजी की असली वजह क्या?

चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे सबसे बड़ी चिंता नए 2026-27 सीजन में शुरुआती स्टॉक यानी ओपनिंग स्टॉक के कम रहने को लेकर है। उपलब्ध उद्योग अनुमानों के मुताबिक नए सीजन की शुरुआत में चीनी का स्टॉक घरेलू खपत की जरूरत के मुकाबले काफी कम हो सकता है।

इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) के अनुमानों के अनुसार 2026-27 सीजन में गन्ने का उत्पादन करीब 46.3 करोड़ टन और चीनी उत्पादन करीब 3.36 करोड़ टन रहने का अनुमान है। उत्पादन पिछले वर्ष के मुकाबले अधिक रहने का अनुमान है, लेकिन पुराने स्टॉक में भारी कमी के कारण शुरुआती महीनों में बाजार पर दबाव बना हुआ है।

ओपनिंग स्टॉक 47 लाख से घटकर 32 लाख टन

चीनी उद्योग के आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 सीजन में पेराई शुरू होने से पहले मिलों के पास करीब 47 लाख टन चीनी का ओपनिंग स्टॉक था। इस बार 2026-27 सीजन शुरू होने से पहले यह स्टॉक घटकर करीब 32 लाख टन रहने का अनुमान है।

यानी एक साल में शुरुआती स्टॉक में करीब 15 लाख टन की कमी आई है। यही कमी बाजार में भविष्य की उपलब्धता को लेकर चिंता पैदा कर रही है।

एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल से भी बदला समीकरण

चीनी की उपलब्धता पर एथेनॉल नीति का भी असर दिखाई दे रहा है। पिछले सीजन में चीनी बनाने लायक गन्ने और शीरे का एक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल किया गया। उद्योग के आंकड़ों के मुताबिक करीब 25 लाख टन चीनी बनाने योग्य गन्ने/शीरे के समकक्ष मात्रा एथेनॉल उत्पादन की ओर गई।

एथेनॉल उत्पादन में मक्का, चावल की टुकड़ी, खराब अनाज के साथ गन्ने और उसके उत्पादों का इस्तेमाल होता है। इससे खाद्य और पशु आहार बाजार के बीच कच्चे माल की उपलब्धता को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ी है।

एथेनॉल बढ़ा तो पशु आहार पर भी पड़ा असर

भारत में एथेनॉल उत्पादन बढ़ने का असर केवल पेट्रोल में ब्लेंडिंग तक सीमित नहीं है। एथेनॉल उद्योग में इस्तेमाल होने वाले अनाज से निकलने वाले उप-उत्पाद पशु आहार और पोल्ट्री फीड में भी इस्तेमाल होते हैं।

उपलब्ध उद्योग आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष देश में करीब 720 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन हुआ। इसके लिए बड़ी मात्रा में अनाज के साथ गन्ने और उसके उत्पादों का इस्तेमाल किया गया।

अनाज की उपलब्धता घटने से पशु आहार और पोल्ट्री फीड की लागत बढ़ने का दबाव बना। इसका असर आगे चलकर दूध, अंडे और अन्य पशु उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

सरकार का फैसला क्यों महत्वपूर्ण?

केंद्र सरकार द्वारा 10 लाख टन रॉ शुगर के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देने का सीधा उद्देश्य घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों पर दबाव कम करना है। DGFT ने 20 अगस्त को इसकी अधिसूचना जारी की। आयात 31 अक्टूबर 2026 तक TRQ के तहत बिना आयात शुल्क किया जा सकेगा।

यह कदम खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार ने लंबे समय बाद घरेलू बाजार में चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए आयात का रास्ता खोला है। रिपोर्टों के मुताबिक इससे करीब एक दशक बाद भारत में इस तरह का बड़ा शुल्क-मुक्त चीनी आयात हो रहा है।

लेकिन आयात की चीनी तुरंत बाजार में नहीं पहुंचेगी

सरकार के फैसले से बाजार में तत्काल मनोवैज्ञानिक राहत मिल सकती है, लेकिन आयातित चीनी को भारत पहुंचने में समय लगेगा। खासकर ब्राजील जैसे प्रमुख निर्यातक देशों से आने वाली चीनी को समुद्री परिवहन में समय लग सकता है।

इसी वजह से व्यापारियों का एक वर्ग मानता है कि आयात का वास्तविक असर बाजार में आने में कुछ समय लगेगा। वहीं सरकार का कदम बाजार में यह संदेश जरूर देता है कि कीमतों को अनियंत्रित बढ़ने नहीं दिया जाएगा।

थोक खरीदार अब नहीं कर सकेंगे लंबी अवधि की जमाखोरी

सरकार ने थोक उपभोक्ताओं पर भी कड़ा शिकंजा कसा है। 10 मीट्रिक टन से ज्यादा मासिक खपत वाले बल्क कंज्यूमर 15 दिन से अधिक की खपत का चीनी स्टॉक नहीं रख सकेंगे। यह व्यवस्था 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेगी।

इस श्रेणी में मिठाई निर्माता, सॉफ्ट ड्रिंक कंपनियां, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, बड़े मिठाई विक्रेता और अन्य संस्थागत खरीदार शामिल हैं।

सरकार खरीद और खपत की निगरानी के लिए GST रिटर्न समेत उपलब्ध लेन-देन के आंकड़ों का इस्तेमाल करेगी। इससे यह जांचने में मदद मिलेगी कि किसी कारोबारी ने अपनी वास्तविक खपत से कहीं अधिक चीनी तो नहीं खरीदी है।

सरकार पहले भी लगा चुकी है स्टॉक लिमिट

चीनी की कीमतों में तेजी के बीच सरकार ने जुलाई में चीनी डीलरों के लिए भी स्टॉक होल्डिंग लिमिट लागू की थी। यह व्यवस्था 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक रखी गई है। सरकार का कहना था कि कुछ जगहों पर जमाखोरी, सट्टेबाजी और बिना वास्तविक माल की आवाजाही के कागजी कारोबार से कृत्रिम कमी का माहौल बन सकता है।

व्यापारियों की अलग राय

व्यापार जगत में सरकार के कदम को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। कुछ व्यापारियों का कहना है कि घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी मौजूद है और मौजूदा तेजी का एक हिस्सा सट्टेबाजी तथा घबराहट में की जा रही खरीद का परिणाम है।

दूसरी ओर, कारोबारियों का एक वर्ग लंबे समय से चेतावनी देता रहा है कि गन्ने और उसके उत्पादों के बड़े पैमाने पर एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल से चीनी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क है कि सरकार को चीनी, एथेनॉल और खाद्य अनाज के बीच संतुलन बनाकर नीति तैयार करनी होगी।

निर्यात से आयात तक बदली तस्वीर

भारत दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में शामिल है। कुछ वर्ष पहले तक देश में घरेलू जरूरतों से अधिक उत्पादन होने पर बड़ी मात्रा में चीनी और चीनी-आधारित उत्पादों का निर्यात होता था।

उपलब्ध वाणिज्यिक आंकड़ों के अनुसार 2022-23 में चीनी, चीनी-शीरा और संबंधित उत्पादों का निर्यात करीब 1.33 करोड़ टन रहा था, जबकि 2023-24 में यह आंकड़ा करीब 51.35 लाख टन बताया गया। अब घरेलू कीमतों पर नियंत्रण के लिए शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देना बाजार की बदली स्थिति को दर्शाता है।

त्योहारी सीजन से पहले सरकार की बड़ी चुनौती

अगस्त से नवंबर के बीच देश में गणेश चतुर्थी, नवरात्र, दशहरा और दीपावली जैसे बड़े त्योहार आते हैं। इस दौरान मिठाई, पेय पदार्थ और खाद्य उद्योग में चीनी की मांग सामान्य दिनों की तुलना में बढ़ जाती है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकता त्योहारी सीजन से पहले पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रखना और कीमतों को नियंत्रण में रखना है।

आम उपभोक्ता को कब मिलेगी राहत?

सरकार के फैसले से चीनी की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन खुदरा बाजार में कीमतों में तुरंत बड़ी गिरावट की गारंटी नहीं है। आयातित रॉ शुगर की उपलब्धता, घरेलू मिलों की बिक्री, परिवहन लागत, त्योहारी मांग और जमाखोरी पर नियंत्रण—इन सभी कारकों पर आने वाले हफ्तों में बाजार की दिशा निर्भर करेगी।

फिलहाल सरकार ने आयात बढ़ाने और स्टॉक सीमित करने की दोहरी रणनीति अपनाई है। एक तरफ 10 लाख टन शुल्क-मुक्त रॉ शुगर बाजार में लाने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ बड़े खरीदारों को सीमित स्टॉक रखने का आदेश दिया गया है।

सीधा असर क्या होगा?

उपभोक्ता: चीनी की उपलब्धता बढ़ने से कीमतों पर दबाव कम होने की उम्मीद।
मिठाई और खाद्य उद्योग: थोक स्टॉक सीमा के कारण खरीद और भंडारण की रणनीति बदलनी पड़ सकती है।
चीनी मिलें: आयातित चीनी से घरेलू कीमतों पर दबाव आ सकता है।
किसान: चीनी मिलों की मांग और गन्ने के वैकल्पिक उपयोग पर असर पड़ सकता है।
पशुपालक-पोल्ट्री उद्योग: अनाज और एथेनॉल के बीच बढ़ती मांग के कारण फीड लागत पर नजर रहेगी।



चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने सरकार को एक दशक बाद बड़े पैमाने पर शुल्क-मुक्त रॉ शुगर आयात का फैसला लेने पर मजबूर किया है। 10 लाख टन आयात, थोक खरीदारों पर 15 दिन की स्टॉक सीमा और जमाखोरी के खिलाफ निगरानी—ये तीनों कदम बाजार को स्थिर करने की कोशिश हैं। अब सबसे बड़ी नजर इस बात पर रहेगी कि आयातित चीनी कितनी जल्दी भारतीय बाजार में पहुंचती है और क्या इससे आने वाले त्योहारी सीजन में आम उपभोक्ता को चीनी की बढ़ी कीमतों से राहत मिलती है।

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