सोजत न्यूज़ | वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश बोराणा
सोजत। सावन माह की अमावस्या को हरियाली अमावस्या के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में वर्षभर आने वाली अमावस्याओं का अपना विशेष धार्मिक महत्व है, लेकिन सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित होने के कारण इस माह की अमावस्या का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन भगवान शिव की आराधना, पितरों के निमित्त तर्पण, दान-पुण्य तथा पौधरोपण को विशेष फलदायी माना गया है।
हरियाली अमावस्या केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और कृषि के महत्व का संदेश देने वाला पर्व भी है। सावन में चारों ओर हरियाली छाने लगती है और इसी कारण इस अमावस्या को हरियाली अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
12 अगस्त को मनाई जा रही हरियाली अमावस्या
हिंदी पंचांग के अनुसार सावन मास की अमावस्या तिथि 12 अगस्त 2026, बुधवार को है। दिए गए पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 12 अगस्त को रात 1:52 बजे से प्रारंभ होकर रात 11:06 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर हरियाली अमावस्या का पर्व 12 अगस्त को ही मनाया जा रहा है।
इस दिन श्रद्धालु सुबह स्नान कर भगवान शिव का पूजन करते हैं। इसके साथ ही पितरों की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और जरूरतमंदों को दान करने की परंपरा है।
🌳 पौधरोपण का विशेष महत्व
हरियाली अमावस्या का सबसे बड़ा संदेश प्रकृति संरक्षण से जुड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन वृक्ष लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। निष्काम भाव से पौधरोपण करने और उसकी नियमित देखभाल करने को पुण्यदायी बताया गया है।
मान्यता है कि वृक्षों को संतान के समान माना जाता है। जिस प्रकार माता-पिता अपनी संतान की देखभाल करते हैं, उसी प्रकार पौधा लगाने के बाद उसकी रक्षा और सेवा करना भी महत्वपूर्ण माना गया है।
इस दिन पीपल, बरगद, नीम, केला, आंवला, बेल, नींबू और तुलसी जैसे पौधे लगाने की परंपरा है। हालांकि पौधा लगाते समय स्थानीय जलवायु और उपलब्ध स्थान के अनुसार उपयुक्त पौधे का चयन करना भी जरूरी है।
पीपल का पौधा लगाने की मान्यता
हरियाली अमावस्या पर पीपल का पौधा लगाना विशेष शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पीपल के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना गया है। इसी कारण पीपल की पूजा और सेवा को पुण्यदायी माना जाता है।
हालांकि पौधा लगाने के साथ उसकी नियमित देखभाल करना भी उतना ही जरूरी है। केवल पौधा लगाकर छोड़ देने के बजाय उसे पानी देना, पशुओं से बचाना और बड़ा होने तक उसकी सुरक्षा करना पर्यावरण संरक्षण की वास्तविक भावना है।
पितरों की शांति के लिए करें तर्पण और दान
हरियाली अमावस्या को पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धालु अपने पूर्वजों को याद कर उनकी शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।
इस दिन सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, गुड़, तिल, फल, अनाज आदि का दान किया जा सकता है। ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन करवाकर दक्षिणा देना भी धार्मिक परंपरा का हिस्सा है।
मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए दान-पुण्य से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
गाय को चारा और रोटी खिलाना भी शुभ
हरियाली अमावस्या के अवसर पर गौसेवा को भी पुण्यदायी माना जाता है। श्रद्धालु गाय को हरा चारा, गुड़ या रोटी खिला सकते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार गौसेवा से देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
इसके साथ ही पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करना और पशु-पक्षियों के प्रति दया भाव रखना भी इस पर्व की भावना के अनुरूप है।
कृषि उपकरणों की पूजा की परंपरा
हरियाली अमावस्या का संबंध कृषि और किसान जीवन से भी गहरा है। सावन में वर्षा के साथ खेतों में हरियाली दिखाई देने लगती है और किसान नई फसल की तैयारी में जुट जाते हैं। इसी कारण कई ग्रामीण क्षेत्रों में इस दिन कृषि उपकरणों की पूजा करने की परंपरा है।
किसान अपने हल, ट्रैक्टर, कृषि यंत्र तथा अन्य उपकरणों की साफ-सफाई कर उनकी पूजा करते हैं। यह पर्व कृषि के प्रति सम्मान और किसान के जीवन में प्रकृति की भूमिका को भी दर्शाता है।
हरियाली अमावस्या पर कौन-कौन से काम करें
सुबह स्नान कर भगवान शिव की पूजा करें।
शिवलिंग पर जल अर्पित कर भगवान शिव का स्मरण करें।
पितरों के निमित्त तर्पण करें।
सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र और फल आदि का दान करें।
पीपल, नीम, बरगद, आंवला, बेल आदि पौधे लगाएं।
लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल का संकल्प लें।
गाय को हरा चारा और रोटी खिलाएं।
पक्षियों के लिए दाना-पानी रखें।
कृषि उपकरणों की साफ-सफाई कर पूजा करें।
जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन करवाएं।
पर्यावरण संरक्षण और जल बचाने का संकल्प लें।
सिर्फ पौधा लगाना नहीं, उसकी रक्षा करना भी जरूरी
हरियाली अमावस्या का वास्तविक संदेश केवल एक दिन पौधा लगाने तक सीमित नहीं है। पौधा लगाने के बाद उसे नियमित पानी देना, उसकी सुरक्षा करना और उसे वृक्ष बनने तक संभालना ही प्रकृति के प्रति सच्ची सेवा है।
आज जब पर्यावरण संरक्षण और लगातार घटते हरित क्षेत्र की चिंता बढ़ रही है, ऐसे में हरियाली अमावस्या समाज को अधिक से अधिक पेड़ लगाने और उनका संरक्षण करने का संदेश देती है।
🌧️ हरियाली और वर्षा से भी जुड़ा है पर्व
सावन वर्षा और हरियाली का महीना माना जाता है। खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं और पेड़-पौधों में नई जान आ जाती है। हरियाली अमावस्या इसी प्राकृतिक बदलाव का उत्सव है। इसलिए इस दिन प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेने की परंपरा है।
धर्म के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश
हरियाली अमावस्या का पर्व हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति की रक्षा ही मानव जीवन की रक्षा है। पेड़ हमें छाया, फल, ऑक्सीजन और पर्यावरण संतुलन प्रदान करते हैं। इसलिए धार्मिक आस्था के साथ यदि प्रत्येक व्यक्ति इस दिन कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी जिम्मेदारी ले, तो यह पर्व वास्तव में सार्थक हो सकता है।
हरियाली अमावस्या पर भगवान शिव की पूजा, पितरों का स्मरण, जरूरतमंदों को दान, गौसेवा और पौधरोपण कर सुख-शांति, समृद्धि तथा पर्यावरण संरक्षण की कामना करें।





