प्यार के आगे झुका समाज’: अंतर-जातीय विवाह में महाराष्ट्र सबसे आगे, राजस्थान,हरियाणा भी पीछे नहीं

‘वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश बोराणा की खास कवरेज
सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं से बढ़ा सामाजिक समरसता का दायरा, तीन साल में लाभार्थियों की संख्या लगभग दोगुनी
सोजत/नई दिल्ली:
भारत में जातिगत भेदभाव की दीवारें अब धीरे-धीरे दरकती दिख रही हैं। अंतर-जातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का असर साफ नजर आ रहा है। साल 2024-25 में देशभर में 26,050 लोगों को अंतर-जातीय विवाह के लिए प्रोत्साहन राशि दी गई, जो पिछले वर्षों की तुलना में एक बड़ी बढ़ोतरी है। यह पहल जातिवाद को खत्म कर सामाजिक भाईचारा मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अंतर-जातीय विवाह को लेकर समाज की सोच में बदलाव आया है और लोग अब सरकारी सहयोग के साथ खुलकर आगे आ रहे हैं।
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तीन साल में लगातार बढ़ोतरी, आंकड़े खुद कहानी कहते हैं
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अंतर-जातीय विवाह के लिए प्रोत्साहन पाने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है—
2022-23: 14,225 लाभार्थी
2023-24: 21,083 लाभार्थी
2024-25: 26,050 लाभार्थी
इन आंकड़ों से साफ है कि बीते तीन वर्षों में इस योजना का दायरा और प्रभाव दोनों तेजी से बढ़े हैं।
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2024-25: महाराष्ट्र सबसे आगे, दक्षिण और उत्तर दोनों सक्रिय
साल 2024-25 में महाराष्ट्र ने अंतर-जातीय विवाह के मामले में देशभर में पहला स्थान हासिल किया—
महाराष्ट्र: 8,566
कर्नाटक: 2,798
तमिलनाडु: 2,476
हरियाणा: 2,350
गुजरात: 1,775
पश्चिम बंगाल: 1,510
छत्तीसगढ़: 1,061
तेलंगाना: 398
राजस्थान 610
खास बात यह है कि हरियाणा जैसे राज्य, जो पहले सामाजिक रूढ़ियों के लिए जाने जाते थे, अब इस बदलाव में पीछे नहीं हैं।
2023-24: कर्नाटक शीर्ष पर, ओडिशा की मजबूत मौजूदगी
साल 2023-24 में तस्वीर कुछ अलग थी—
कर्नाटक: 4,054
ओडिशा: 3,614
तमिलनाडु: 2,392
गुजरात: 1,599
पंजाब: 1,412
इसके अलावा मध्य प्रदेश (1,198), पश्चिम बंगाल (1,153), असम (1,022), हिमाचल प्रदेश (816) और केरल (736) में भी बड़ी संख्या में लोगों को योजना का लाभ मिला।
2022-23: दक्षिण भारत की अगुवाई
साल 2022-23 में भी कर्नाटक सबसे आगे रहा—
कर्नाटक: 3,651
ओडिशा: 1,791
केरल: 1,533
हरियाणा: 1,441
तमिलनाडु: 1,282
इसके अलावा गुजरात, हिमाचल, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी, तेलंगाना और चंडीगढ़ जैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी इस योजना का लाभ लोगों को मिला।
संविधान और कानून: छुआछूत पर सख्त प्रतिबंध
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 छुआछूत को पूरी तरह समाप्त करता है और किसी भी रूप में इसके पालन को अपराध मानता है।
नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के तहत छुआछूत के कारण किसी व्यक्ति पर रोक-टोक करना दंडनीय अपराध है।
वहीं अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 अत्याचारों को रोकने, विशेष अदालतें गठित करने और पीड़ितों को राहत व पुनर्वास देने के लिए लागू किया गया है।
इन कानूनों को लागू करने की जिम्मेदारी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की है, जबकि केंद्र सरकार वित्तीय सहायता देकर इन्हें मजबूत करती है।
केंद्र की विशेष योजना: आधा खर्च राज्य, पूरा सहयोग केंद्र से
अंतर-जातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार एक विशेष योजना के तहत—
पुलिस सेल और विशेष थानों को मजबूत करती है
विशेष अदालतों का संचालन करती है
पीड़ितों को आर्थिक सहायता देती है
सामाजिक जागरूकता फैलाने के कार्यक्रम चलाती है
इस योजना में खर्च राज्य और केंद्र सरकार के बीच 50-50 प्रतिशत बांटा जाता है, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों को 100 प्रतिशत सहायता केंद्र सरकार देती है।
डॉ. अंबेडकर अंतर-जातीय विवाह सामाजिक एकता योजना
जातिवाद से निपटने के लिए एक अहम पहल है डॉ. अंबेडकर फाउंडेशन की योजना।
जिन विवाहों में पति या पत्नी में से कोई एक अनुसूचित जाति (SC) से हो
और दंपती की सालाना आय 5 लाख रुपये तक हो
वे इस योजना के तहत 2.50 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस योजना का उद्देश्य सामाजिक समरसता और समानता को बढ़ावा देना है।
ऑनर किलिंग पर सख्त रुख
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 31 मई 2018 को सभी राज्यों को एडवाइजरी जारी कर ऑनर किलिंग जैसे जघन्य अपराधों को रोकने, त्वरित कार्रवाई करने और दोषियों को सख्त सजा देने के निर्देश दिए थे।
सरकारी आंकड़े यह साफ संकेत देते हैं कि अंतर-जातीय विवाह अब केवल व्यक्तिगत साहस का विषय नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक बदलाव की मजबूत लहर बन चुका है। बढ़ती प्रोत्साहन राशि और कानूनी संरक्षण के साथ अब “प्यार” जाति की सीमाओं को पार कर समाज को नई दिशा दे रहा है।
‘प्यार के आगे झुकी जाति’: राजस्थान में अंतर-जातीय विवाह बना सामाजिक बदलाव की नई कहानी
सोजत/जयपुर/अलवर/भीलवाड़ा (ग्राउंड रिपोर्ट):
राजस्थान के गांवों और कस्बों में जहां कभी जाति पूछकर रिश्ते तय होते थे, वहीं अब तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। अंतर-जातीय विवाह, जो कभी सामाजिक टकराव और डर का कारण बनते थे, अब सरकारी संरक्षण और आर्थिक प्रोत्साहन के सहारे स्वीकार्यता की ओर बढ़ रहे हैं।
राज्य में ऐसे कई युवा जोड़े हैं, जिन्होंने जाति की दीवार तोड़कर साथ जीने का फैसला किया—और अब उन्हें सिर्फ कानून का ही नहीं, बल्कि सरकार की योजनाओं का भी सहारा मिल रहा है।
“डर तो था, लेकिन सरकार साथ खड़ी दिखी”
अलवर जिले के रहने वाले एक युवक ने बताया,
> “शादी के वक्त समाज का डर था। लेकिन जब पता चला कि सरकार अंतर-जातीय विवाह को प्रोत्साहन देती है और कानून हमारे साथ है, तो हिम्मत मिली।”
ऐसी ही कहानी भीलवाड़ा, दौसा और भरतपुर जैसे जिलों में भी सुनने को मिलती है, जहां युवा दंपती अब छुपकर नहीं, बल्कि कानूनी तरीके से विवाह कर रहे हैं।
आंकड़े बताते हैं: राजस्थान में धीमा लेकिन ठोस बदलाव
केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अनुसार—
2022-23 में राजस्थान में 610 लोगों को अंतर-जातीय विवाह के लिए प्रोत्साहन राशि मिली
2023-24 में 282 लाभार्थी सामने आए
संख्या भले ही कुछ अन्य राज्यों से कम हो, लेकिन सामाजिक नजरिए से यह बदलाव बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि राजस्थान लंबे समय तक जातिगत सख्ती और ऑनर से जुड़े मामलों के लिए जाना जाता रहा है।
गांवों में सोच बदली, शहरों में हौसला बढ़ा
ग्राउंड लेवल पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि—
शहरों में लोग पहले ही इस बदलाव को स्वीकार कर चुके हैं
अब ग्रामीण इलाकों में भी धीरे-धीरे माहौल बदल रहा है
एक सामाजिक कार्यकर्ता के अनुसार,
> “अब लोग सिर्फ जाति नहीं, शिक्षा और रोजगार भी देख रहे हैं। सरकारी योजना ने इस सोच को वैधता दी है।”
कानून बना ढाल, प्रोत्साहन बना सहारा
राजस्थान में अंतर-जातीय विवाह करने वाले जोड़ों को—
नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955
SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989
का कानूनी संरक्षण मिलता है। इसके साथ ही केंद्र सरकार की योजना के तहत आर्थिक मदद दी जाती है, जिससे जोड़ों को नया जीवन शुरू करने में सहूलियत मिलती है।
कम आय वाले दंपती डॉ. अंबेडकर अंतर-जातीय विवाह सामाजिक एकता योजना के तहत 2.50 लाख रुपये तक की सहायता के लिए आवेदन भी कर सकते हैं।
ऑनर किलिंग के खिलाफ सख्ती का असर
राज्य के पुलिस अधिकारियों मानते हैं कि केंद्र सरकार की 2018 की एडवाइजरी के बाद—
ऑनर किलिंग के मामलों पर सख्ती बढ़ी है
शिकायत दर्ज कराने में लोगों का भरोसा बढ़ा है
हालांकि चुनौतियां अब भी हैं, लेकिन डर का माहौल पहले जैसा नहीं रहा।
“यह सिर्फ शादी नहीं, समाज का इम्तिहान है”
जयपुर के एक वरिष्ठ समाजशास्त्री कहते हैं,
> “राजस्थान में अंतर-जातीय विवाह सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं है, यह पूरे समाज की सोच की परीक्षा है। और अब समाज धीरे-धीरे इस परीक्षा में पास हो रहा है।”
(ग्राउंड रिपोर्ट):
राजस्थान में बदलाव शोर से नहीं, धीमे कदमों से आ रहा है। लेकिन हर ऐसा विवाह, जो जाति की सीमा तोड़ता है, समाज की एक दीवार गिरा देता है। सरकारी योजनाएं, कानूनी सुरक्षा और बदलती सोच—तीनों मिलकर राजस्थान में एक नई सामाजिक कहानी लिख रहे हैं।



