सोजत न्यूज़ | ✍️ वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश बोराणा
सोजत। सोशल मीडिया पर इन दिनों तेजी से वायरल हो रही “सीजेपी” यानी “कॉकरोच जनता पार्टी” अब चर्चा का बड़ा विषय बन चुकी है। महज 7 दिन पहले ऑनलाइन बनाई गई इस पार्टी ने अपने व्यंग्यात्मक और सरकार विरोधी अंदाज से इंटरनेट पर तहलका मचा दिया है। बताया जा रहा है कि इस पार्टी को अमेरिका के बोस्टन शहर से अभिजीत दिपके नामक व्यक्ति संचालित कर रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर इस पार्टी की लोकप्रियता इतनी तेजी से बढ़ी कि कुछ समय के लिए इसने देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बीजेपी को भी पीछे छोड़ दिया।
हालांकि, सोशल मीडिया पर बढ़ती लोकप्रियता के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि यह पार्टी वास्तव में चुनाव लड़ना चाहे तो क्या इसे “कॉकरोच” यानी तिलचट्टे का चुनाव चिन्ह मिल पाएगा? साथ ही क्या चुनाव आयोग इसे मोबाइल फोन का प्रतीक दे सकता है, जिसकी मांग पार्टी समर्थकों द्वारा की जा रही है?
चुनाव आयोग कैसे तय करता है चुनाव चिन्ह?
भारत में चुनाव चिन्ह देने का अधिकार भारत निर्वाचन आयोग के पास होता है। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार चुनाव चिन्ह दो प्रकार के होते हैं—
आरक्षित चुनाव चिन्ह
ये चिन्ह मान्यता प्राप्त बड़ी राजनीतिक पार्टियों को दिए जाते हैं, जैसे बीजेपी का कमल, कांग्रेस का हाथ और आम आदमी पार्टी का झाड़ू।
मुक्त चुनाव चिन्ह (Free Symbols)
ये नई, छोटी पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए होते हैं। आयोग की सूची में 100 से अधिक मुक्त प्रतीक शामिल हैं, जिनमें ताला-चाबी, एयर कंडीशनर, लैपटॉप, सीसीटीवी कैमरा, शतरंज बोर्ड, नेल कटर जैसे कई अनोखे चिन्ह शामिल हैं।
पहले पार्टी का पंजीकरण जरूरी
किसी भी नई पार्टी को चुनाव लड़ने से पहले जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29A के तहत चुनाव आयोग में पंजीकरण करवाना होता है। पंजीकरण के बाद ही पार्टी चुनाव चिन्ह के लिए आवेदन कर सकती है।
सीजेपी फिलहाल केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय है और अभी तक उसे राजनीतिक दल के रूप में आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है। ऐसे में चुनाव चिन्ह की मांग भी फिलहाल शुरुआती स्तर पर ही मानी जा रही है।
क्यों मुश्किल है ‘कॉकरोच’ चुनाव चिन्ह?
चुनाव आयोग के 1968 के चुनाव चिन्ह आदेश में स्पष्ट प्रावधान है कि कोई भी नया चुनाव चिन्ह किसी पशु या पक्षी जैसा नहीं होना चाहिए। यही नियम सीजेपी के सामने सबसे बड़ी बाधा बन सकता है।
कॉकरोच यानी तिलचट्टा जैविक रूप से एक जीव या कीट की श्रेणी में आता है। ऐसे में आयोग इसे “जानवर” की श्रेणी में मान सकता है, जिससे यह चुनाव चिन्ह अस्वीकार हो सकता है।
हालांकि, इस पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अंतिम निर्णय चुनाव आयोग का होगा कि वह तिलचट्टे को किस श्रेणी में रखता है।
पशु अधिकारों के कारण बदले थे नियम
जानकारी के अनुसार 1991 के बाद चुनाव आयोग ने पशु आधारित नए चुनाव चिन्ह देने पर रोक लगा दी थी। इसके पीछे पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की शिकायतें थीं कि चुनाव प्रचार के दौरान असली जानवरों को रैलियों में घुमाया जाता था और उनके साथ दुर्व्यवहार होता था।
इसके बाद आयोग ने नए पशु प्रतीकों को मंजूरी देना लगभग बंद कर दिया। हालांकि जिन राजनीतिक दलों के पास पहले से पशु आधारित प्रतीक थे, उन्हें छूट दी गई। उदाहरण के तौर पर बहुजन समाज पार्टी का हाथी और फॉरवर्ड ब्लॉक का शेर आज भी मान्य चुनाव चिन्ह हैं।
मोबाइल फोन का चिन्ह भी आसान नहीं
सीजेपी समर्थकों ने मोबाइल फोन को भी संभावित चुनाव चिन्ह के रूप में पेश किया है, लेकिन यहां भी समस्या सामने आ सकती है। चुनाव आयोग की मौजूदा मुक्त प्रतीकों की सूची में “मोबाइल फोन” शामिल नहीं है।
हालांकि सूची में लैंडलाइन टेलीफोन और मोबाइल चार्जर जैसे प्रतीक जरूर मौजूद हैं, लेकिन मोबाइल फोन को स्वतंत्र प्रतीक के रूप में शामिल नहीं किया गया है। ऐसे में आयोग से विशेष अनुमति मिलने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है।
सोशल मीडिया की लोकप्रियता और राजनीतिक हकीकत अलग
सीजेपी भले ही सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हो और युवाओं के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हो, लेकिन भारत की चुनावी राजनीति में प्रवेश करना इतना आसान नहीं है। राजनीतिक दल के पंजीकरण से लेकर चुनाव चिन्ह हासिल करने तक कई कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।
फिलहाल “कॉकरोच जनता पार्टी” इंटरनेट की दुनिया में चर्चा का केंद्र बनी हुई है, लेकिन वास्तविक चुनावी मैदान में उतरने के लिए उसे चुनाव आयोग के कड़े नियमों की बड़ी परीक्षा से गुजरना होगा।