सोजत की प्राकृतिक मेहंदी : सदियों की विरासत, संघर्ष और स्वर्णिम भविष्य की चुनौतियां,जी.आई. टैग तो मिला, पर सोजत के मेहंदी किसान को अभी भी इंसाफ का इंतजार



सोजत की धरती पर मेहंदी की खुशबू सदियों पुरानी है। यहां की मिट्टी में एक अनोखी विशेषता है — कम बारिश और सीमित जल स्रोतों के बावजूद यहां उगने वाली मेहंदी न केवल पूरे हिंदुस्तान में बल्कि विदेशों तक अपनी पहचान बना चुकी है। वैदिक काल से सुहाग के प्रतीक के रूप में, तीज-त्यौहारों की शोभा बढ़ाने वाली और प्राकृतिक चिकित्सा में जड़ी-बूटी के रूप में काम आने वाली इस मेहंदी का इतिहास उतना ही गहरा है जितनी इसकी रंगत।


**खेती का आधार, जीवन की पहचान**

सोजत तहसील की लगभग 90,000 हेक्टेयर कृषि भूमि में से 23,144 हेक्टेयर पर मेहंदी की फसल होती है। यह फसल जीवन में मात्र एक बार बोई जाती है और बरसाती पानी से उगी मेहंदी का रंग सबसे अधिक गहरा और टिकाऊ होता है। सिंचाई से उगाई गई मेहंदी की रंगत अपेक्षाकृत हल्की रहती है, यही कारण है कि सावणु फसल को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

मेहंदी की खेती का विस्तार अब सोजत तहसील की सीमाओं को पार कर मारवाड़ जंक्शन, ओलवी और मेड़ता तक हो चुका है। फसल की कटाई व निदान में सोजत के पुरुष और महिलाएं पारंपरिक रूप से माहिर हैं, लेकिन अब यूपी, बिहार, कोटपुतली और बहरोड़ से भी मजदूर अस्थाई रूप से आने लगे हैं। कटाई के मौसम में मजदूरी 2,000 रुपए प्रतिदिन तक पहुंच जाती है। छोटी मेहंदी कटाई मशीनें भी अब किराए पर उपलब्ध हैं — लेकिन इन सबके बावजूद सोजत का किसान कर्ज में डूबा हुआ है और उसे मेहंदी का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।


**अतीत का संघर्ष — असली मेहंदी की लड़ाई**

आजादी के बाद से ही सोजत की प्राकृतिक मेहंदी को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। फरीदाबाद के व्यापारियों ने सस्ती मेहंदी बाजार में उतारी, वहीं नीमच और आवली की कम रंग वाली मेहंदी ने भी चुनौती पेश की। लेकिन सोजत के कुछ दूरदर्शी व्यापारियों ने इस संघर्ष में अपनी विरासत को बचाए रखा।

**मेहंदी रत्न : वो शख्सियतें जिन्होंने सोजत की पहचान बचाई**

**स्व. श्री सूरजमल  भाटी** — सन् 1950 में किराणे की दुकान छोड़कर घरेलू चकियों से मेहंदी पाउडर बनाना शुरू किया। बिजली न होने के बावजूद इंजन से पिसाई की और “कमल छाप मेहंदी” को मेसर्स सूरज मेहंदी के नाम से बाजार में उतारा। बाद में एमरी स्टोन चकियां और पुलवराइजर मशीन लगाकर उत्पादन को आधुनिक बनाया। उनका फर्म आज भी “सूरजमल ताराचंद” के नाम से चल रहा है। उल्लेखनीय है कि जब सरकार ने मेहंदी पर परचेज टैक्स लगाया, तब इन्होंने रेवेन्यू बोर्ड में निगरानी संख्या 40/79/पाली दायर कर 29 अप्रैल 1984 को टैक्स माफी का ऐतिहासिक फैसला करवाया, जो आज भी एक रिपोर्टेबल नजीर है। जी.आई. टैग के लिए श्रीमती सिद्धकंवर भाटी ने सन् 1950 के मेहंदी बिल व शपथपत्र प्रस्तुत किए थे।

**स्व. श्री जी. चम्पालाल  सुराणा** — सन् 1962 में “गुलाब गोल्ड” ब्रांड से प्राकृतिक मेहंदी पाउडर का व्यापार शुरू किया जो आज भी जारी है। गुणवत्ता से कभी समझौता न करने की उनकी नीति ने सोजत की साख को जीवित रखा। यदि यह संघर्ष न होता तो आज मेहंदी की पहचान फरीदाबाद या नीमच की हो जाती — सोजत की नहीं। इसीलिए आज भी लोकगीतों में सोजत की मेहंदी का ही जिक्र होता है।

**स्व. श्री मोतीलाल  लोढ़ा** — सन् 1976 में किराणा व्यवसाय छोड़कर “मेसर्स एम.एम. सोजत वाला” के नाम से “हथलेवा छाप मेहंदी” का कारोबार शुरू किया। इन्होंने सबसे पहले मेहंदी को पाउच पैकिंग में उपलब्ध कराने की शुरुआत की — जो उस दौर में एक क्रांतिकारी कदम था।

इनके अलावा शिवप्रताप रामचंद्र मोदी (लक्ष्मी छाप), मेसर्स जे. संपतराज चोहान (डबल हाथी छाप), प्रमानन्द एण्ड कम्पनी (ब्राइट हिना) जैसे व्यापारियों ने भी सोजत की नेचुरल मेहंदी की परंपरा को जीवित रखा। स्व. श्री रामचंद्र जी टाक (काकू) और मोहनलाल जी टाक (MLT) ने फरीदाबाद के व्यापारियों को मेहंदी पाता बेचने का आढ़त कार्य शुरू कर नई राह दिखाई।

**जी.आई. टैग — एक ऐतिहासिक उपलब्धि**

मेहंदी उत्पादक किसान समिति के प्रतिनिधि विकास टाक के अथक प्रयासों से 14 अक्टूबर 2021 को भारत सरकार ने सोजत की मेहंदी को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जी.आई.) टैग प्रदान किया। यह टैग सोजत की मेहंदी की विशिष्ट पहचान और गुणवत्ता का आधिकारिक प्रमाण है।


**मंडी की स्थिति और किसान की पीड़ा**

सोजत में ए-ग्रेड कृषि मंडी स्थापित है, जिसने पिछले वित्तीय वर्ष में मंडी शुल्क संग्रहण से 675 लाख रुपए की आय अर्जित की। इसके बावजूद विडंबना यह है कि मेहंदी की फसल का कोई सरकारी समर्थन मूल्य निर्धारित नहीं है। किसान उचित मूल्य न मिलने के कारण कर्ज में डूब रहे हैं।

इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में मेहंदी को “जींस” के रूप में दर्ज किया गया है, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में इसे “जंगली पौधा” माना जाता है। खातेदारी में मिट्टी वर्गीकरण के अंतर्गत दर्ज होने से किसानों को कोई लाभ नहीं मिलता और केंद्र सरकार की फसल बीमा योजना के जटिल प्रावधानों के चलते मेहंदी उत्पादक इस सुविधा से भी वंचित हैं।

कृषि विपणन बोर्ड के श्री राजेश चोहान ने बताया कि मोड़ भट्ठा से कृषि मंडी रोड के सौंदर्यीकरण के लिए 354 लाख रुपए की स्वीकृति पीडब्ल्यूडी एजेंसी को भेजी गई है और शीघ्र ही कार्य शुरू होगा। साथ ही मंडी परिसर में मेहंदी की गुणवत्ता जांच के लिए प्रयोगशाला हेतु 184 लाख रुपए की प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति गत माह जारी की गई है।


**नकली मेहंदी और केमिकल का खतरा**

आधुनिक दौर में नेचुरल मेहंदी के सामने एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है। बाजार में केमिकल युक्त नकली मेहंदी, हेयर डाई और मेहंदी कोन धड़ल्ले से बिक रहे हैं, जिनके पैकेजिंग पर सामग्री सूची तक नहीं लिखी होती। इनमें निषिद्ध रसायन **PICRAMIC ACID** और **PHENYLENEDIAMINE (PPD)** जैसे खतरनाक केमिकल का उपयोग हो रहा है, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।

टैक्स की दृष्टि से भी असमानता स्पष्ट है — प्राकृतिक मेहंदी पर मात्र 5 प्रतिशत जीएसटी है, जबकि मेहंदी कोन पर 18 प्रतिशत। इसके बावजूद यह वसूली वास्तव में कितनी होती है, यह एक अनुत्तरित प्रश्न है। सेंट्रल एक्साइज कमिश्नर दिल्ली ने 6 नवंबर 1996 को जारी पत्र में मेहंदी-हिना पाउडर को वर्गीकृत किया था, लेकिन आज तक उसका पालन नहीं हो रहा।


       व्यापार संघ का नया अध्याय

हाल ही में सोजत मेहंदी व्यापार संघ समिति के चुनाव सम्पन्न हुए, जिसमें सुनीलकुमार गहलोत अध्यक्ष, प्रशांत टाक उपाध्यक्ष, श्यामसुंदर टाक सचिव, ओमप्रकाश तंवर सह-सचिव और लक्ष्मण टाक कोषाध्यक्ष निर्वाचित हुए। चुनाव अधिकारी एडवोकेट मानवेन्द्र भाटी व एडवोकेट पवन सेन की देखरेख में निष्पक्ष चुनाव संपन्न हुए।

लक्ष्मण गहलोत, राजेन्द्र चोहान, माणक चोहान, श्याम पंवार, विनोद लोढ़ा सहित अनेक वरिष्ठ व्यापारियों ने नई कार्यकारिणी से मांग की कि किसानों, व्यापारियों, दलालों और हमालों के हितों की रक्षा की जाए, सोजत की मेहंदी की साख को बनाए रखा जाए और जी.आई. टैग का समुचित उपयोग सुनिश्चित किया जाए।

          आगे की राह

सोजत की प्राकृतिक मेहंदी अपनी सदियों पुरानी विरासत, जी.आई. टैग की मान्यता और पीढ़ियों के संघर्ष के बल पर आज भी खड़ी है। जरूरत है तो बस इतनी — सरकार मेहंदी को फसल का दर्जा दे, समर्थन मूल्य निर्धारित करे, नकली और केमिकल युक्त मेहंदी पर कठोर कार्रवाई हो और किसान को उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिले। तभी सोजत की मेहंदी की यह खुशबू आने वाली पीढ़ियों तक महकती रहेगी।

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