राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ जिले के कीरतपुरा गांव में एक तीन साल की बच्ची चेतना के बोरवेल में गिरने के बाद से पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई है। यह घटना 23 दिसंबर की दोपहर को हुई, जब चेतना अपने घर के परिसर में खेलते हुए एक 700 फीट गहरे बोरवेल में 150 फीट की गहराई पर फंस गई। घटना के बाद शुरू हुआ रेस्क्यू ऑपरेशन अब तक का सबसे लंबा और चुनौतीपूर्ण अभियान साबित हो रहा है।

कोटपूतली बोरवेल हादसा: 115 घंटे से फंसी मासूम को बचाने की कोशिशें, बार-बार असफल हो रहा रेस्क्यू ऑपरेशन
रेस्क्यू ऑपरेशन की वर्तमान स्थिति
एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, स्थानीय प्रशासन, रैट माइनर्स और देसी जुगाड़ विशेषज्ञों की संयुक्त टीम चेतना को बचाने के लिए दिन-रात काम कर रही है। तीन जेसीबी मशीन, दो पाइलिंग मशीन, दो क्रेन और 10 ट्रैक्टर समेत अन्य भारी मशीनरी का उपयोग किया जा रहा है। बावजूद इसके, बच्ची तक पहुंचने में अब तक सफलता नहीं मिली है। चेतना पिछले 115 घंटों से बोरवेल में फंसी है, और यह समय बच्ची और उसके परिवार के लिए बेहद कठिन साबित हो रहा है।
रेस्क्यू ऑपरेशन में बाधाएं और असफलता के कारण
1. मौसम की चुनौती
रेस्क्यू ऑपरेशन के चौथे और पांचवें दिन बारिश और खराब मौसम ने अभियान को कई बार बाधित किया। एनडीआरएफ इंचार्ज योगेश कुमार मीणा ने बताया कि बारिश के कारण पाइप वेल्डिंग और अन्य तकनीकी काम रुक गए। गीली मिट्टी और फिसलन ने स्थिति को और मुश्किल बना दिया।
2. मशीनों की कमी और देरी
रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए आवश्यक आधुनिक मशीनों की उपलब्धता में देरी हुई। पाइलिंग मशीन और अन्य उपकरण हरियाणा से मंगवाए गए, लेकिन घटनास्थल तक पहुंचने में सड़क निर्माण और बिजली के पोल हटाने जैसी तैयारियों के कारण समय लगा।
3. देसी जुगाड़ पर अत्यधिक निर्भरता
रेस्क्यू ऑपरेशन के शुरुआती दिनों में देसी जुगाड़ तकनीकों का उपयोग किया गया। स्थानीय विशेषज्ञों ने हुक और अंब्रेला रॉड का उपयोग करके बच्ची को निकालने की कोशिश की, लेकिन यह प्रयास असफल रहे। चेतना को 20 फीट ऊपर लाने के बाद वह दोबारा फंस गई।
4. पत्थर की मोटी परतें
बोरवेल के आसपास की जमीन के अंदर मोटी पत्थर की परतें अभियान में सबसे बड़ी बाधा बनीं। खुदाई के दौरान पत्थरों से टकराने के कारण काम बार-बार रुकता रहा। एनडीआरएफ टीम ने नई मशीनरी का उपयोग कर पत्थरों को काटने का प्रयास किया, लेकिन यह प्रक्रिया धीमी और कठिन है।
5. प्रशासनिक देरी और समन्वय की कमी
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन ने कार्रवाई में देरी की, जिससे रेस्क्यू ऑपरेशन प्रभावित हुआ। एसडीआरएफ की टीम को जयपुर से बुलाने और ऑपरेशन की शुरुआत में देरी होने से कीमती समय बर्बाद हुआ।
चेतना के परिवार की हालत
चेतना के माता-पिता भूपेंद्र सिंह और धोली देवी इस घटना के बाद गहरे सदमे में हैं। उनकी मां की तबीयत बिगड़ गई है, और पिता की हालत भी निढाल है। परिवार और ग्रामीण लगातार बच्ची की सलामती की प्रार्थना कर रहे हैं।
रेस्क्यू ऑपरेशन की तकनीकी प्रगति
बच्ची को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। कैमरे के जरिए चेतना की स्थिति का आकलन किया गया, जिसमें शुरुआत में उसकी हरकतें दिखाई दीं। हालांकि, बाद में चेतना ने कोई मूवमेंट नहीं किया, जिससे चिंता बढ़ गई है। टीम ने ऑक्सीजन पाइप के जरिए बच्ची तक ऑक्सीजन पहुंचाने का इंतजाम किया है।
स्थानीय लोगों और प्रशासन की भूमिका
स्थानीय ग्रामीणों ने हादसे के पहले दिन बच्ची को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किए। उन्होंने हुक और रस्सी का उपयोग कर चेतना को 20 फीट ऊपर तक खींचा, लेकिन इसके बाद वह अटक गई। ग्रामीणों ने प्रशासन की देरी पर नाराजगी जताई है और बेहतर प्रबंधन की मांग की है।
उम्मीदें और चुनौतियां
रेस्क्यू ऑपरेशन में लगी टीमों ने कहा है कि वे चेतना को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही हैं। हालांकि, खराब मौसम, तकनीकी बाधाएं और जमीन की संरचना चुनौती बनी हुई है। रेस्क्यू ऑपरेशन लगातार जारी है, और पूरे देश की नजरें इस अभियान पर टिकी हैं।