हमें ये पृथ्वी से मिलते हैं। तैलीय बीज को पीसकर तैल बनाया जाता है जिसको हम खाद्य पदार्थ के रूप में प्रयोग किया करते हैं तैल से हमें चिकनाई की मात्रा मिलती जो शरीर के लिए आवश्यक है लेकिन मात्रा से अधिक उपयोग हानिकारक है इसलिए तिरमाली से परहेज़ करना चाहिए।
घृत हमें पशुओं के दूध से मिलता है और मादा पशु अपने खाए गए आहार से दूध का उत्पादन किया करती हैं। आहार के पचने की प्रक्रिया भी नियत होने के खाद्य की परिणिति पशुओं के स्नायुओं और नाड़ियों से होते हुए दूध बन जाता है जिसमें वसा की मात्रा आहार की प्रकृति के नियमानुसार शरीर से बाहर आता है।
वसा हमें भोजन में चिकनाई देने का काम करता है।अधिक मात्रा में सेवन भी हानिकारक होता है। आजकल वसा अन्य उपायों से भी प्राप्त किया जा रहा है जो स्वास्थ्य के लिए पूर्णतः हानिकारक है। जो हमें हवन के लिए, दीप जलाने के लिए और सामूहिक भोज के लिए सस्ते में उपलब्ध हो रहा है।
आप सभी विज्ञ हैं इसलिए तैल, तैलीय वस्तु,घी और इससे निर्मित वस्तुओं का उपयोग अपने स्वास्थ्य को देखते हुए करना चाहिए।
आचार्य माधव शास्त्री जी कि कलम से।