कंधे पर बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचा भाई: 3 किमी पैदल चला, कर्मचारियों के रवैये पर उठे सवाल



✍️ वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश बोराणा

ओडिशा/क्योंझर:
मानवता को झकझोर देने वाली एक हैरान कर देने वाली घटना सामने आई है। ओडिशा के क्योंझर जिले में एक गरीब आदिवासी युवक अपनी मृत बहन का कंकाल कंधे पर लेकर बैंक पहुंच गया। यह घटना न केवल संवेदनहीन व्यवस्था को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि जागरूकता की कमी किस हद तक इंसान को मजबूर कर सकती है।

          क्या है पूरा मामला?

क्योंझर जिले के डियानाली गांव निवासी जीतू मुंडा अपनी बहन कालरा मुंडा के बैंक खाते से 20 हजार रुपए निकालना चाहता था। उसकी बहन का निधन 26 जनवरी 2026 को हो चुका था।

जीतू कई बार बैंक के चक्कर लगा चुका था, लेकिन हर बार बैंक कर्मचारियों ने उससे कह
    “जिसका खाता है, उसे लेकर आओ

जीतू ने बार-बार बहन की मौत की जानकारी दी, लेकिन उसे सही प्रक्रिया नहीं बताई गई। आखिरकार मजबूर होकर उसने ऐसा कदम उठाया, जिसने सभी को स्तब्ध कर दिया।

     3 किलोमीटर तक कंधे पर कंकाल

निराश और परेशान जीतू मुंडा ने अपनी बहन की कब्र खोदकर उसका कंकाल निकाला और उसे कंधे पर रखकर करीब 3 किलोमीटर पैदल चलकर मल्लिपसी स्थित ओडिशा ग्रामीण बैंक शाखा पहुंच गया।

बैंक के बरामदे में जैसे ही उसने कंकाल रखा, वहां अफरा-तफरी मच गई। कर्मचारी और ग्राहक भयभीत हो गए और तुरंत पुलिस को सूचना दी गई

      पुलिस ने संभाला मामला

सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची। थाना प्रभारी किरण प्रसाद साहू ने बताया—

जीतू मुंडा अनपढ़ है और बैंकिंग नियमों से पूरी तरह अनजान था

उसे “नॉमिनी” और “कानूनी वारिस” की प्रक्रिया के बारे में कोई जानकारी नहीं थी

बैंक कर्मचारियों ने भी उसे सही तरीके से मार्गदर्शन नहीं दिया


पुलिस ने जीतू को समझाया और आश्वासन दिया कि उसे उसकी बहन के खाते से पैसे दिलाने में मदद की जाएगी।


         क्यों जरूरी थे ये पैसे?

जीतू मुंडा की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है। उसकी बहन कालरा मुंडा के खाते में जमा 20 हजार रुपए ही उसके लिए जीवनयापन का सहारा थे।

       सबसे दुखद पहलू यह है कि:

खाते में नॉमिनी बने पति और बेटे की भी पहले ही मौत हो चुकी है

ऐसे में जीतू ही एकमात्र दावेदार बचा है



           फिर क्या हुआ?

पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में:

कंकाल को दोबारा कब्रिस्तान में दफनाया गया

जीतू को कानूनी प्रक्रिया समझाई गई

जल्द पैसे दिलाने का भरोसा दिया गया

               बड़ा सवाल

यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है—

क्या बैंक कर्मचारियों को गरीब और अनपढ़ लोगों को सही जानकारी नहीं देनी चाहिए?

क्या सिस्टम इतना जटिल है कि एक भाई को बहन का कंकाल उठाने पर मजबूर होना पड़े?

क्या ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की भारी कमी है?

यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता और जागरूकता की कमी का आईना है। जीतू मुंडा का यह कदम भले ही अज्ञानता में उठाया गया हो, लेकिन यह समाज और प्रशासन दोनों के लिए एक बड़ा सबक है।

जरूरत है कि सरकारी और बैंकिंग प्रक्रियाओं को आम लोगों के लिए सरल बनाया जाए, ताकि कोई और “जीतू” ऐसी दर्दनाक स्थिति का सामना न करे।

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