एक साल तक सोना क्यों नहीं खरीदें? PM मोदी के 72 बिलियन डॉलर वाले फॉरेक्स लॉजिक ने बढ़ाई चिंता,सिर्फ 4 चीजों पर खर्च हो रहे 20 लाख करोड़ रुपए,
विदेशी मुद्रा भंडार बचाने की रणनीति के पीछे सरकार का बड़ा आर्थिक गणित, पेट्रोल-डीजल से लेकर सोना और विदेश यात्राओं तक बढ़ता आयात बिल बना चिंता का कारण…..



✍️ सोजत न्यूज़ | वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश बोराणा

नई दिल्ली/सोजत। देश में लगातार बढ़ती महंगाई, अंतरराष्ट्रीय तनाव और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव के बीच प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा देशवासियों से “एक साल तक सोना नहीं खरीदने” की अपील चर्चा का बड़ा विषय बन गई है। इस अपील के पीछे केवल भावनात्मक या सामाजिक कारण नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने का बड़ा आर्थिक लॉजिक बताया जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार भारत हर साल अरबों डॉलर का सोना विदेशों से आयात करता है और इसका भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। ऐसे में जब कच्चे तेल की कीमतें पहले से ऊंची हों और विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घट रहा हो, तब सोने का अत्यधिक आयात देश की आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त दबाव बना सकता है।

सिर्फ 4 चीजों पर खर्च हो रहे 20 लाख करोड़ रुपए

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने पेट्रोल-डीजल, सोना, खाद्य तेल और खाद के आयात पर करीब 240.7 अरब डॉलर खर्च किए। भारतीय मुद्रा में यह राशि लगभग 20 लाख करोड़ रुपए से अधिक बैठती है। यह देश के कुल आयात का लगभग 31 प्रतिशत हिस्सा है। यानी हर तीन रुपए में से एक रुपया केवल इन चार आवश्यक वस्तुओं के आयात पर खर्च हो रहा है।

इसके अलावा विदेश यात्राओं पर भी भारतीयों द्वारा भारी खर्च किया जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2023-24 में विदेश यात्राओं पर करीब 31.7 बिलियन डॉलर यानी लगभग 2.72 लाख करोड़ रुपए खर्च किए गए।

     क्यों बढ़ी सरकार की चिंता?

आर्थिक जानकारों का कहना है कि वर्तमान समय में पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, इसलिए महंगे तेल का सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है।

ऐसे समय में यदि सोने का आयात भी तेजी से बढ़ता है तो डॉलर की मांग और बढ़ जाती है। इससे भारतीय रुपए पर दबाव बढ़ सकता है और रुपए की कीमत गिर सकती है। रुपए में कमजोरी आने से तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य जरूरी आयातित वस्तुएं और महंगी हो सकती हैं।

लगातार घट रहा विदेशी मुद्रा भंडार

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार 1 मई को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 7.794 अरब डॉलर घटकर 690.693 अरब डॉलर रह गया। इससे पहले वाले सप्ताह में भी करीब 4.82 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी। लगातार दो सप्ताह की गिरावट ने सरकार और आर्थिक विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।

दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता भारत

भारत दुनिया में सोने का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता माना जाता है। देश में हर साल लगभग 700 से 800 टन सोने की खपत होती है, जबकि घरेलू उत्पादन केवल 1 से 2 टन के बीच रहता है। यानी भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत से ज्यादा सोना विदेशों से आयात करता है।

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का सोना आयात बढ़कर लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष यह करीब 58 अरब डॉलर था। इस प्रकार एक साल में सोना आयात में लगभग 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

अक्टूबर 2025 में शादी सीजन की मांग को देखते हुए भारत ने अकेले 14.7 अरब डॉलर का सोना आयात किया था। वर्तमान में भारत के कुल आयात बिल में सोने की हिस्सेदारी करीब 9 प्रतिशत बताई जा रही है, जो कच्चे तेल के बाद दूसरा सबसे बड़ा आयात खर्च है।

बैंक भी रोक रहे हैं सोने का आयात

सूत्रों के अनुसार सरकार द्वारा 3 प्रतिशत इंटीग्रेटेड जीएसटी लागू किए जाने के बाद कई बैंकों ने सोने का आयात कम कर दिया है। इसके चलते अप्रैल महीने में सोने का आयात लगभग 30 वर्षों के न्यूनतम स्तर तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।

सोने की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव

देश में सोने की कीमतें पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा में हैं। अभी सोना प्रति 10 ग्राम लगभग 1.50 लाख रुपए के ऊपर बना हुआ है। जनवरी 2026 के अंत में कीमतें करीब 1.90 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गई थीं। उस समय ऊंची कीमतों के कारण बाजार में खरीदारी काफी धीमी पड़ गई थी और सर्राफा कारोबार प्रभावित हुआ था।

हालांकि बाद में कीमतों में कुछ नरमी आने पर लोगों ने फिर से खरीदारी शुरू कर दी। बावजूद इसके, पिछले एक वर्ष में सोने की कीमतों में लगभग 40 प्रतिशत तक की तेजी देखी गई है।

पीएम मोदी की अपील का बाजार पर असर संभव

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रधानमंत्री Narendra Modi की अपील का असर आम जनता पर पड़ा और सोने की खरीदारी कम हुई, तो आने वाले महीनों में सोने की कीमतों में गिरावट देखी जा सकती है। हालांकि इससे ज्वेलर्स और सर्राफा कारोबारियों की चिंताएं भी बढ़ सकती हैं क्योंकि शादी सीजन में सोने की बिक्री उनके व्यापार का सबसे बड़ा आधार मानी जाती है।

देशहित बनाम व्यक्तिगत निवेश की बहस तेज

सोशल मीडिया और व्यापारिक हलकों में अब यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या वर्तमान परिस्थितियों में सोने की खरीद सीमित करना देशहित में जरूरी कदम हो सकता है। कुछ विशेषज्ञ इसे विदेशी मुद्रा बचाने की रणनीति बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे आम निवेशकों और ज्वेलरी कारोबार पर असर डालने वाला कदम मान रहे हैं।

फिलहाल इतना तय है कि सोना अब केवल गहनों या निवेश का विषय नहीं रह गया, बल्कि यह सीधे देश की आर्थिक स्थिरता और विदेशी मुद्रा भंडार से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।

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